xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml" xml:lang="en" lang="en" dir="ltr"> world of creativity: अक्टूबर 2022

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

body sheming

इंसान नहीं मजाक हूं मैं
जिसे दुनिया अतरंगी नामों से पुकारती है
सांवला सा रंग है मेरा
कद काठी भी कुछ खास नहीं
दिखने में मोटी सी हूं
नाक भी थोड़ी टेडी है
आंखें पूरी खुलती नहीं
ना गालों पर डिंपल पड़ते हैं
चाल में अदाएं नहीं
बातों में मिठास नहीं
ना गुलाब की पंखुड़ियों से होठ है
दांत भी मोती से चमकीले नहीं
ना पतली सी कमर है
ना सुरीली सी गर्दन
ना बदन से सुलगते अंगारे
ना खूबसूरत झील सी निगाहें
बेढगी से बाल है
कपड़े पहनने का सलिका भी नहीं
ना किसी की नजर मुझ पर ठहरती है
ना मुझे देख कोई आहे भरता है
शायद यही वजह है कि दोस्तों के मजाक का विषय हूं मैं
रिश्तेदारों की तानों का हिस्सा
घरवालों की शर्मिंदगी की वजह
दुनिया की नजरों में इंपरफेक्ट हूं मैं,,,,

गोरी,,, अठारह वर्षीय एक लड़की जो अभी अपने शब्दों को कविता का रूप देने की कोशिश कर रही थी कि किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज  सुन उसने अपनी डायरी तकिए के नीचे छुपाई और आंखों से आंसू पोछकर आईने में खुद को देखा और चेहरे पर हल्की सी दर्द भरी मुस्कुराहट उभर आई लेकिन आंखें रोने की वजह से अभी भी लाल थी उसने आंखें बंद की और गहरी सांस लेते हुए खुद से बोली = बस अब नहीं.. अब तू बिल्कुल नहीं रोएगी, अब एक भी आंसू तेरी आंखों से नहीं बहना चाहिए तुझे तेरे महादेव की कसम है,,,
गोरी ने अपनी आंखें खोली फिर आईने पर नजर पड़ गई और आसू खुद ब खुद बाहर निकल आए,,,
सांवला रंग था उसका, उस पर भी जगह-जगह धब्बे थे लंबाई भी कुछ खास नहीं थी और शरीर में मोटी थी, घुंघराले बाल जिनमें ऊपर सफेद कलर के बाल मोतियों से चमक रहे थे,,,,
गोरी फुर्ती से आईने के सामने से हट गई और जाकर दरवाजा खोला, दरवाजे पर उसकी छोटी बहन किरण खड़ी थी किरण अंदर आकर बेड पर पर चढ़ते हुए बोली,,,
दीदी बाहर आपकी सहेली निशिका मिली थी वह कह रही थी कि आप कल कॉलेज की फ्रेशर पार्टी में नहीं जा रहे
नहीं मेरी इच्छा नहीं है....,, गोरी ने संक्षेप में जवाब दिया और लेट गई
ऐसे कैसे इच्छा नहीं है आप तो कितना एक्साइटेड थी ना फ्रेशर पार्टी को लेकर फिर अचानक क्या हुआ
किरण के सवाल पर गोरी के जहन में अपने दोस्तों की बातें घूमने लगी,,,

तो डन गाइस कल सब प्रेशर पार्टी में शॉर्ट्स पहन कर आ रही हो,.... पांच छ लड़कियों के ग्रुप में से एक लड़की बोली, ग्रुप में गोरी भी उनमें ही साथ खड़ी थी सब ने हां में सिर हिला दिया,,
उनमें से एक लड़की गोरी के कंधे पर हाथ रख कर बोली= हम सबका तो ठीक है पर गोरी को शॉर्ट्स कहां से मिलेगा, शॉर्ट ड्रेस भी इसके तो लार्ज साइज में ही आती है,,,
उसके कहते ही लड़किया एक साथ हंसने लगी और गोरी भी मुस्कुरा दी,
गौरी बाई चांस तुझे शॉर्ट ड्रेस मिल भी जाए तो कलर थोड़ा ढंग का चूज करना, पिछली बार की तरह रेड मत पहन कर आ जाना तुम पर वह सूट नहीं करता और ब्लैक और वाइट तो बिल्कुल मत पहनना.... दूसरी लड़की ने कहा,,, और प्लीज बालों को कलर कर लेना,,,,
गोरी बाहर से उनकी बातों पर मुस्कुरा रही थी पर अंदर ही अंदर उसे घुटन महसूस हो रही थी फिर भी वह मुस्कुरा कर बोली= ठीक है समझ गई और ड्रेस थोड़ी लूज ही पहनूंगी ताकि फटने का डर नहीं रहे
कहकर गोरी हंसने लगी और बाकी लड़कियां भी,,,,

दीदी कहीं आप ड्रेस के बारे में तो नहीं सोच रही ना.... किरण की बात सुन गोरी होश में आई,,,
आई नो पक्का ड्रेस की प्रॉब्लम ही होगी वैसे मेरे पास ड्रेस तो है लेकिन आप पर फिट नहीं बैठेगी
गौरी ने किरण की तरफ देखा और अपने आंसू रोकते हुए बोली= कोई जरूरत नहीं है और कहां ने मेरी इच्छा नहीं है जाने कि, मुझे यह फंक्शन पसंद नहीं पता है ना तुझे अब तू सो जा मैं पानी लेकर आ रही हूं,,,

गोरी कमरे से बाहर आई और सीधा छत पर आकर रुकी उसे अंदर घुटन हो रही थी वह ऊपर छत पर एक कोने में बैठ गई और मुंह पर हाथ रखकर जोर जोर से रोने लगी,, कुछ देर रो लेने के बाद उसने अपने गले में पहने महादेव के लॉकेट को मुट्ठी में पकड़ा और मन ही मन उनसे शिकायतें करने लगी,,
आपने मुझे ऐसा क्यों बनाया, क्यों मैं सबकी तरफ परफेक्ट नहीं हूं, लोग क्यों मुझे बार बार यह एहसास दिलाते हैं कि मुझ में कुछ कमी है, आप ही बताइए मैं लंबी नहीं हूं गोरी नहीं हूं, पतली नहीं हूं तो इसमें मेरा क्या दोष है, क्या मैं अपनी अपनी सेप साइज चेंज कर सकती हूं... नहीं ना... चाहते हुए मैं कुछ नहीं कर सकती फिर लोग क्यों हंसते हैं मुझ पर, बताइए ना महादेव क्या मैं इंसान नही हूं, सब अपने अकॉर्डिंग ही क्यों जज करते हैं, जो मन में आए बोल देते हैं क्या उन्हें बिल्कुल एहसास नहीं होता कि जब वह मुझे मेरी कमियां गिनाते हैं तो कैसा लगता है मुझे,,,
मैं पढ़ाई में अच्छी हू, अच्छी इंसान हूं,  इन बातो की कोई इंपॉर्टेंस नहीं, किसी के लिए भी कुछ भी करने की तैयार रहती हूं लेकिन किसी को भी वह सब नजर नहीं आता, नजर आता है तो यह है कि मेरा रंग सांवला है मैं नाटी हूं मोटी हूं, सुंदर नहीं दिखती,
क्या जिंदगी जीने के लिए इंसान को बॉडी की शेप साइज कलर की चेकलिस्ट पर खरा उतरना जरूरी है, 

गोरी आधे घंटे तक वहीं बैठे बैठे सोचती रही फिर खुद को शांत कर कमरे में आकर लेट गई,,,

आज गोरी के घर में फंक्शन था रिश्तेदार और मेहमान आए हुए थे गोरी की दोनों बहने किरण और सुरभी मेहमानों से मिल रही थी लेकिन गोरी बहुत कम कमरे से बाहर आ रही थी रिश्तेदार उसके लिए विलेन की तरह थे वह जानती थी कि वह बाहर उनके सामने गई तो वह कैसे कैसे सवाल पूछेंगे
अरे गोरी तू तो दिन दिन और छोटी होती जा रही है जमीन में दसेगी क्या
गोरी बेटा थोड़ी बहुत डाइटिंग पर ध्यान दिया कर, जानती है ना आजकल के लड़कों को पतली लड़कियां पसंद आती है
बेटा तू ना चेहरे पर हल्दी और मुल्तानी मिट्टी लगाया कर उससे चेहरे पर निखार आएगा
निखिल जी की दो बेटियां तो सोना है बस गोरी ही पता नहीं ऐसी क्यों पैदा हो गई, कभी-कभी तो शक होता है यह इनकी बेटी है भी या नहीं"

ऐसे तरह-तरह के सवाल सुनते हुए ही गोरी बड़ी हुई थी और आज भी रिश्तेदारों के इन सवालों का सामना करने से बचने के लिए गोरी बाहर नहीं आ रही थी लेकिन मम्मी की आवाज सुनकर उसे बाहर आना ही पड़ा,,,
वह बाहर आकर सबकी नजरों से छुपते हुए एक और आकर खड़ी हो गई जहां किसी की नजर उस पर ना जाए, कितना अजीब था ना बचपन में फंक्शंस का नाम सुनते ही वह उछलने लगती थी और फंक्शन जब खुद के घर में हो तो खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं होता था, रिश्तेदारों से मिलने का, बच्चों के साथ खेलने का इंतजार रहता था क्योंकि बचपन में कोई इतना जज नहीं करता था लेकिन आज उसे फंक्शन के नाम पर पहले से ही डर लगने लगता था कि सब इकट्ठा होंगे, उसे उसकी बॉडी को लेकर जज किया जाएगा सबके सामने इंपरफेक्ट फील करवाया जाएगा जिसको जो कमी दिखेगी बोल कर चला जाएगा, इन सब की वजह से पूरा परिवार होने के बावजूद गोरी खुद को तन्हा महसूस करती थी,,,,
कॉलेज के दोस्तों के नाम पर सिर्फ एक लड़की थी जिसके साथ गोरी कंफर्टेबल महसूस करती थी मजाक मजाक में वह भी गोरी को कह देती थी कि हम दोनों साथ में चलते वक्त अच्छे नहीं लगते ऐसा लगता है मैं किसी स्कूल की बच्ची के साथ चल रही हूं ,,उसके सवाल पर गोरी सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाती थी,,
कॉलेज लाइफ जिंदगी का वह फेज होता है जिसमें हर तरह की फीलिंग्स जकड़ लेती है अट्रैक्शन, प्यार, दोस्ती मस्ती, इन सब से बाहर जैसे कुछ हो ही नही, गलत और सही का कोई अंदाजा नहीं होता, उसके लिए उसकी चुनी गई राह ही सही होती है फिर चाहे वह गलत ही क्यों ना हो, सब की नजर उस पर ही आकर ठहरे, उसे सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंस मिले फिर इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े और अपोजिट अट्रैक्शन जिसे नाम दिया जाता हैं प्यार का वह तो नशे की तरह जकड़ लेता है, इस फीलिंग्स से बचना सबसे मुश्किल होता है,,,
गोरी भी उम्र के उसी दौर में थी, उसकी फ्रेंड से लेकर क्लास की हर लड़की कमिटेड थी और इसलिए सब गोरी के सिंगल होने पर उसे डम समझते थे, ये तो फैक्ट है की कॉलेज लाइफ में सिंगल होना भी एक शर्मिंदगी जैसा है। गोरी भी क्लास के एक लड़के को पसंद करती थी लेकिन उससे कह पाने की कभी हिम्मत नहीं होती थी यह सोच कर कि सब की तरह उसने भी उसे जज किया तो अगर उसने उस लड़के को अपनी फीलिंग बता दी तो पूरी क्लास उस लड़के का भी मजाक बना देगी, यह सोचकर वह अपनी फीलिंग को छुपा लेती लेकिन अपनी फीलिंग को छुपाए रखना उसके लिए कितना मुश्किल था यह वही जानती थी।।।

गोरी ने इन सबके बीच खुद को पढ़ाई में पूरी तरह झोंक दिया था क्योंकि उसका मानना था कि वह सक्सेस हो जाएगी तो सबका मुंह बंद हो जाएगा, कितने सारे एग्जाम्पलस देखे थे, लोगो ने जिन जिन ने कमियां निकाली वो लाइफ में कुछ कर सबका मुंह बंद कर देते है  वो अपनी कमियों को अपनी ताकत बना लेते हैं, गोरी को भी लगता था कि अपनी सारी कमियों को अपनी ताकत बनाएगी कुछ ऐसा कर के दिखाएगी जिंदगी में कि किसी को मौका ही नहीं मिलेगा उसकी बॉडी को लेकर उसे ताने मारने का,,
वह रात दिन किताबे लिए बैठी रहती थी लेकिन किस्मत ने यहां भी उसका साथ नही दिया, उसका कॉन्फिडेंस इतना गिर गया था कि वह सबके सामने खड़ी होकर प्रेजेंटेशन भी नहीं दे पाती थी वही उसकी क्लास की लड़कियां बिना पढ़े भी कॉन्फिडेंटली प्रेजेंटेशन देकर चली जाती थी, टीचर्स का ध्यान भी गोरी पर नहीं जाता था, इन सबके चलते गोरी का हौसला, उसका सेल्फ कॉन्फिडेंस उसकी इनर वैल्यूज सब खत्म धीरे-धीरे खत्म होने लगी और इसका नतीजा यह हुआ कि स्कूल में टॉप करने वाली गोरी कॉलेज के पहले साल में ही कुछ सब्जेक्ट में फेल हो गई,,,
उसके फेल होने की वजह किसी को मालूम नहीं पड़ी ना किसी ने जानने की कोशिश की, बल्कि दोस्तों रिश्तेदारों और परिवार से बस एक ही बात सुननी पड़ी, भगवान ने शक्ल सूरत तो नहीं दी लेकिन अक्ल तो दी थी उसका भी सही से इस्तेमाल कर लेती तो जिंदगी सुधर जाती है,,,
गोरी की कमियों में उसका फेलियर भी शामिल हो गया था, पढ़ाई के नाम पर थोड़ी-बहुत तारीफ सुनने को मिल जाती थी लेकिन सब खत्म होने लगा था।
कई बार गोरी ने खुद को खत्म करने का सोचा लेकिन परिवार के बारे में मां पापा के बारे में सोचकर वह रुक जाती, कितनी चोट पहुंचा लेती थी खुद को, कभी भगवान के सामने रोते हुए अपने हाथ जला लेती थी ताकि वह उसका दर्द समझे, कभी ब्लेड से हाथों को काट लेती कभी रात रात भर रोती रहती, सब से छुपकर सुंदर दिखने के नए-नए नुस्खे अपनाती, वजन कम करने के लिए खाना कम कर दिया, चाहे भूख से उसकी जान निकलती हो, सब के सो जाने के बाद दौड़ लगाती ताकि कोई देखकर हंसे नहीं, जहां से उसे जैसे उपाय मिले, किसी ने बताए वो सब उसने ट्राई किया लेकिन शरीर में कोई बदलाव नहीं आता, कैसे जैसे कर कॉलेज खत्म हुई, , आगे कहीं जाकर नौकरी करने की हिम्मत ही नहीं थी उसमे, इसलिए घर से बाहर निकलना बंद कर दिया घर को ही उसने अपना एक कंफर्ट जॉन बना लिया था, ताकि दूसरो की नजरे उसे देख उसका मजाक ना बनाए,
शादी की उम्र हुई, घरवाले ने रिश्ते देखना शुरु किया, एक दो रिजेक्शंस के बाद गोरी की सगाई तय हुई,,
24 साल की गोरी आईने के सामने बैठी तैयार हो रही थी क्योंकि सगाई थी उसकी,  लड़के को सिर्फ फोटो में देखा था उम्र थोड़ी ज्यादा थी सावला और मोटा सा था लेकिन गोरी को कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उसे तो परफेक्ट मैन की तलाश भी नहीं थी, दूसरी वजह यह भी थी की बाकी लड़कियों की तरह गोरी जैसी इंपरफेक्ट लड़कियों के लिए हैंडसम और परफेक्ट लड़कों के सपने देखना तो जैसे गुनाह था और अगर उन्होंने लड़के को लेकर अपनी डिमांड रख भी दी तो सब उन्हीं पर हंसने लगते थे कि परफेक्ट लड़का चाहिए तो खुद को भी परफेक्ट होना चाहिए इसीलिए गोरी ने कोई शर्त नहीं रखी थी कि उसे कैसा पार्टनर चाहिए और किसी ने गोरी से यह सवाल पूछा भी नहीं था,,,,
गौरी की सगाई हुई, वह खुश थी की अब जिंदगी का नया दौर शुरू हो रहा है तो अब कोई उसे जज नहीं करेगा वह सुकून से जिंदगी जी पाएगी, उसका पति उसे लेकर कभी शर्मिंदगी महसूस नही करेगा लेकिन उसे नहीं मालूम था कि बॉडी सैमिंग का सही मतलब उसे शादी के बाद समझ आने वाला था, नई बहू को देखने आई आसपास की औरतों रिश्तेदारों के मुंह से अपने शरीर रंग रूप की बनावट पर टिप्पणियां सुन उसे समझ आ गया था कि उसकी जिंदगी आगे भी आसान नहीं होने वाली, वह सुनती रही लेकिन उसकी सारी उम्र हिम्मत तब टूट गई थी जब शादी के कुछ साल बाद ही ससुराल वाले और जिसके साथ खुशहाल जिंदगी के सपने देख कर वो आई थी उसी पति ने बात बात पर उसके रंग रूप को लेकर उसे ताने देना शुरू कर दिया,, हर आदमी को एक परफेक्ट पत्नी चाहिए फिर चाहे वह खुद कैसे भी हो, गोरी के साथ भी ऐसा ही होने लगा था उसका पति चाहे कैसा भी हो लेकिन अब उसे गोरी को अपने दोस्तों से मिलाने में भी झिझक होती थी, कुछ सालो में ही इसी वजह से गौरी के साथ झगड़े और मारपीट शुरू होने लगे थे, कोई नही था जो उसका साथ देता, मायके जाती तो उसकी कमियों को लिस्ट में एक ये भी जुड़ जाता की गृहस्ती भी नहीं संभाल पाई, सुंदर होती तो पति भी दिलजस्पी लेता, इस तरह की औरत से तो दूर ही भागेगा, सारे रास्ते बंद हो चुके थे और अब गोरी में हिम्मत नहीं बची थी लोगो का सामना करने की, उसे समझ आ गया था की लोगो की सोच कभी नहीं बदल सकती,,,,

आखिर तंग आकर गोरी ने एक दिन अपनी जिंदगी खत्म कर ली, खुद को आजाद कर लिया इस समाज से और यहां के लोगो के ताने से,,,,किसी को वजह तक पता नहीं चली कि उसने ऐसा क्यों किया क्योंकि बाहरी तौर पर तो वह ठीक ही थी असली लड़ाई तो उसकी खुद के भीतर थी जिसे लाख कोशिशों के बाद भी वह जीत नहीं पाई।।।।।

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बॉडी शमिंग.... एक ऐसी बीमारी जो लोगों की छोटी सोच से पनपती है, अगर भीड़ के बीच खड़ा होकर कोई बॉडी शमिंग पर स्पीच देने लग जाए या दोस्तों के बीच यह विषय छिड़ जाए तो सब हंसने लगते है क्योंकि उनके अनुसार बॉडी शमिंग इज नॉट ए बिग डील, यह कोई समस्या का विषय नहीं है,  इस शब्द का अर्थ कोई नहीं समझ पाता शिवाय उन लोगों के जो इसका शिकार होते हैं, शरीर पर लगी हुई चोट आसानी से दिख जाती है लेकिन अंदरूनी चोट चाहे जितनी गहरी हो किसी को नजर नहीं आती और बॉडी शमिंग वही अंदरूनी चोट है जो हंसते हुए इंसान की हस्ती, उसका अस्तित्व मिटा देती हैं उसके वजूद को मिटा देती है। मानसिक रूप से उसे इतना कमजोर बना देती है की कुछ भी करने लायक खुद को नही समझता,,,दूसरो के द्वारा उड़ाए गए अपने शरीर के मजाक से हालत होकर लोग खुद से नफरत करने लगते है, उन्हे अपनी जिंदगी बोझ लगने लगती हैं और वो न चाहते हुए भी बोझ बनकर रह जाते हैं,,,
कहने को तो हर कोई कहता है की लोग हमारे बारे मे क्या बोलते हैं क्या सोचते हैं हमे फर्क नहीं पड़ता चाहिए लेकिन वास्तविकता में ऐसा होता नही, सबको फर्क पड़ता है की लोग उसे लेकर कैसी टिप्पणियां करते हैं, उसकी बॉडी में कितने डिफेक्ट निकालते है,

"तन की सुंदरता से ज्यादा मन की सुंदरता जरूरी है" ये लाइन सिर्फ कहने के लिए बनी है, सच यही है की मन से पहले तन की सुंदरता देखी जाती हैं, लड़के हो या लड़किया, पार्टनर चुनते वक्त यह नही देखते की उनका व्यक्तित्व कितना अच्छा है, उनके आंतरिक गुण कैसे है, वो देखते हैं तो सिर्फ उनकी सुंदरता, ताकि किसी से मिलाते वक्त उन्हें झिझक महसूस ना हो,
खैर.......!!!!!!

दो दिन पहले न्यूज में आया था की बॉडी सेमिंग से परेशान होकर एक औरत ने सुसाइड कर लिया, तो वही से ये टॉपिक दिमाग में आया तो गोरी का किरदार लिख दिया,,,,

कैसी लगी बताइएगा, इंतजार रहेगा आपकी प्रतिकियाओ का....... बाकी इस कहानी का मोरल मुझे भी नही पता क्योंकि बॉडी सैमिंग को लोग अपना पर्सनल अधिकार समझते हैं की वो जिसके बारे मे चाहे जैसी टिप्पणियां कर सकते हैं उनकी सोच को रोकने वाला कोई भी नही तो चाहे, सो.....


MaNiShA NeTwAL

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

abstract painting

सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

हक है हमारा तुम पर

कृष्णा... यार हमें बहुत अजीब लग रहा है पापा जी ने इतनी जल्दी क्यों बुलाया होगा...? 19- 20 वर्षीय लड़की अपनी ही हम उम्र लड़की से बोल रही थी उसके चेहरे पर उदासी की लकीरे साफ दिखाई दे रही थी,,, 
दोनों कॉलेज के बाहर खड़ी बस का इंतजार कर रही थी कृष्णा= यार सूरभी मुझे ना तेरा भविष्य संकट में लग रहा है... 
सुरभि हैरानी से उसकी तरफ देखकर= क्यों..? 
कृष्णा= मुझे लगता है चाचा जी ने फिर तुम्हारे लिए कोई लड़का ढूंढ लिया है,,, 
सुरभि आंखों में नमी लिए बोली= पापा जी क्यों नहीं समझते हमारी बात हम कितनी बार मना कर चुके हैं हमें इतनी जल्दी शादी नहीं करनी अभी कॉलेज खत्म होने में पूरा डेढ़ साल बाकी है और हमें पता है शादी के बाद हमें कोई नहीं पढने देगा... 
कृष्णा उसे चुप कराती हैं "देख सुरभि मैं अभी बोल रही हूं एक बार आवाज उठा अपने लिए बोल दे उन्हे की तुम्हें नहीं करनी है अभी शादी अगर उन्होंने जबरदस्ती शादी कराई तो तू घर छोड़कर चली जाएगी... 
कृष्णा... सुरभि थोड़े गुस्से और रूआसी आवाज में चिल्लाई,,, पापा जी है वो हमारे हक है उनका हमारे ऊपर हम उन्हें तकलीफ नहीं पहुंचा सकते और इसमें गलत ही क्या है वह अपनी बेटी की शादी ही तो कराना चाहते हैं हर मां बाप का सपना होता है कि अपने बच्चों का घर बसते देखें,,,,
कृष्णा सुरभि का हाथ पकड़कर उसकी आंखों से बहते आंसूओ को साफ करते हुए= और बच्चों का क्या.. क्या उन्हें एक बार भी पूछना जरूरी नहीं समझते कि उन्हें क्या चाहिए, सुरभि तुम्हारी ही तरह कोई बच्चा अपने मां-बाप के खिलाफ नहीं जाना चाहता लेकिन क्या हमारी जिंदगी पर केवल दूसरों का ही हक होता है हमारा कोई हक नहीं है... कृष्णा उसका चेहरा पकड़कर= क्या तुम खुश हो...?
सुरभि रोते हुए उसके गले से लिपट जाती है कृष्णा उसके बालों को सहलाते हुए= तू चिंता मत कर मैं अपने पापा से बात करूंगी कि वह चाचा जी को समझाएगै... 
सुरभि= नहीं कृष्णा तुझे हमारी दोस्ती की कसम तू ऐसा कुछ नहीं करेगी पहले ही हमारी शादी को लेकर घर में रोज बहस होती है हम अब तंग आ चुके हैं अब और बहस नहीं चाहिए.. पापा जी का जो फैसला होगा हमें मंजूर है...
लेकिन सुरभि... कृष्णा अपनी बात खत्म कर पाती उससे पहले की बस आ गई और सुरभि चुपचाप बस में चढ़ गई कृष्णा भी उसके पीछे-पीछे बस में आती है बस पूरी तरह भरी हुई थी इसलिए दोनों 10 मिनट के रास्ते खड़ी थी,,,
बस गांव की कच्ची सड़क पर आकर रूकती है कृष्णा और सुरभि किराया देती है और नीचे उतर जाती है कच्ची सड़क से कुछ ही दूरी पर सुरभि का घर था और कृष्णा का दुसरी तरफ दोनों पगडंडियों से होकर अपने अपने घरों की ओर बढ़ जाती है,,, 
सुरभि चौधरी परिवार की बेटी थी घर में कुल मिलाकर 10 लोग रहते थे बुजुर्ग दादा-दादी ताऊजी ताई जी मां पापा भाई भाभी (ताऊ जी का बेटा) सुरभि और एक उसका सगा भाई जो उससे 2 साल छोटा था ताऊजी के 3 लड़कियां थी जिनकी शादी 18 साल की होने से पहले करा दी गई 21 साल की होने से पहले तीनों के बच्चे हो चुके थे और कोई भी 12वीं के आगे नहीं बढ़ पाई थी सुरभि की जिद पर कि वह इतनी जल्दी शादी नहीं करेगी उसे 2 साल का वक्त और दिया गया था पर आसपास और खुद उसके परिवार के तानों से तंग आकर उसके पापा जितनी जल्दी हो सके उसकी शादी कराना चाहते थे सुरभि सेकंड ईयर में थी उसका भाई अभी स्कूल में पढ़ रहा था सुरभि के ताऊ जी का लड़का जो सुरभि से केवल एक ही साल बड़ा था पिछले साल उसकी भी शादी हो चुकी थी और उसकी पत्नी भी शादी के एक महीने बाद ही ससुराल आ गई थी उन्होंने भी कभी कॉलेज का मुंह नहीं देखा था और अब तो वह मां बनने वाली है उम्र सुरभि से भी छोटी है,,,, 
वहीं कृष्णा उसी गांव में अपने छोटे से परिवार के साथ रहती है उसके पिता गांव की सरकारी स्कूल में छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं और मां ग्रहणी है कृष्णा और सौम्या उनकी दो बेटियां और दादी बस इतना सा परिवार है उसका उसके पिता ने कभी उसकी शादी की बात नहीं की क्योंकि कृष्णा खुले विचारों वाली लड़की थी उसे गलत बात का विरोध करना आता था पर उसकी दादी और मा रोज उसके पापा से उसके रिश्ते की बात करते पर वह हर बार कुछ न कुछ कहकर बात टाल देते,,, 

यह गांव है साहब यहां इंसान के रूप में आज भी कई बेजुबान जानवर रहते हैं जहां ने किसी के टूटते सपनों की चीखें सुनाई देती है और ना ही किसी का खुद पर खुद का हक है वह चाहे फिर लड़का हो या लड़की...

सुरभि घर पहुंचती है घर का माहौल देखकर उसे सब कुछ समझ आ गया था वह अंदर आती है हॉल में कुर्सियों पर बड़े ठाठ से उसके दादाजी मुछे ताने बैठे थे और उनके पास उसके ताऊजी और पापा जी, परिवार बेशक मध्यवर्गीय था पर जाटों का ठाठ तो अमीरों की अमीरी को भी रोंधने वाला होता है और उनके सामने तीन और आदमी बैठे थे वहीं बरामदे में सुरभि की दादी ताई जी मां और भाभी उसका ही इंतजार कर रही थी,,, 
सुरभि बेटा आ गई तुम... जा जल्दी से तैयार हो जाओ... उसकी मां ने कहा और उसकी भाभी की तरफ देख कर= लता बहू सुरभि को तैयार कर दे,,,, 
मां... सुरभि के मुंह से धीरे से आवाज निकली,,, 
दादी= छोरी.. बहुत सुन ली है तेरी अब नहीं... जा कर तैयार हो जाओ... 
लता सुरभि के पास आकर बोली= दीदी अब कोई फायदा नहीं है सगाई की पूरी रस्मे हो गई है वह तो जाने वाले थे पर आप आ रही है यह सुनकर रुक गए,, 
सुरभि हैरानी से सबको देखती है फिर लता की तरफ देख कर भाभी= बिना हमसे पूछे सगाई कर दी हमने तो लड़के को देखा भी नहीं यहां तक कि उनकी फोटो भी नहीं देखी और ना ही उन्होंने हमारी... 
यह सब हमारे यहां नहीं होता गुड्डू तेरी बहनों ने भी तो बिना फोटो देखे की शादी की थी ना आज बच्चे खेल रहे हैं उनकी गोद में.... सुरभि की ताई जी बोली,,, 
सुरभि को अब समझ आ गया था कि अब उसके बोलने का कोई फायदा नहीं था वह लता के साथ चली जाती है कुछ देर में सलवार कमीज पहने सिर पर दुपट्टा डाल कर हाथ में चाय की ट्रे लेकर मेहमानों के सामने आती है उसके हाथ काप रहे थे वह खुद को संभालते हुए चाय उन्हें देती है और सबका आशीर्वाद लेती है,,, 
सुरभि के दादा जी= यह है हमारी सुरभि... घर का पूरा काम करती है और साथ में थोड़ी पढ़ाई भी कर लेती हैं,,,
सामने बैठा आदमी जो लड़की का पिता था= चौधरी साहब हमें ज्यादा पढ़ी लिखी बहू नहीं चाहिए बस घर का काम आना चाहिए आप तो जानते ही हैं दिलीप की मां के पैरों में दर्द रहता है बहू आ जाएगी तो उन्हें भी सहारा मिल ही जाएगा और कमाने के लिए दिलीप है ना एक दो महीने में किसी कंपनी में नौकरी लग जाएगा,,, 
उनकी बातें चालू थी सुरभि कुछ देर उनके सामने खड़ी रहती है फिर सामने वाला आदमी उसे नेक के तौर पर कुछ पैसे देता है कुछ देर में वह चले जाते हैं सुरभि के घरवालों उन्हे सुरभि की एक फोटो देते हैं और वह भी लड़के की फोटो सुरभि के घर वालों को दे जाते हैं उनके जाने के बाद और सुरभी अपने पिता के पास आकर बोली= पापा जी आपने हमसे एक बार भी पूछना जरूरी नहीं समझा क्यों...? 
सुरभि के पिता उसके सिर पर हाथ रखकर= क्योंकि हक है हमारा तुम पर बाप है हम तुम्हारे... तुम्हारी जिंदगी का तुम्हारी शादी से पहले हर फैसला लेने का हक रखते हैं हम... 
हमारी पढ़ाई... सुरभि ने सिर झुकाए कहां,,, 
उसके पिता बोले= शादी से पहले हम तुम्हें पढा रहे हैं शादी के बाद तुम पर सिर्फ तुम्हारे पति का हक होगा और वह जो फैसला ले तुम्हें मानना पड़ेगा,,, 
सुरभि अपने कमरे में आती है और चुपचाप बैठ जाती है एक सवाल जो उसके मन में चल रहा था शादी से पहले उस पर माता-पिता का हक था शादी के बाद पति का पर क्या पति का खुद पर हक होगा उस पर भी तो उसके माता-पिता का हक है ना अगर उसका खुद पर हक होता तो वह खुद ही अपनी होने वाली पत्नी को देखने आता ना,,, 
उसके कानों में कृष्णा की बातें गूंज रही थी "क्या हमारी जिंदगी पर केवल दूसरों का ही हक होता है हमारा खुद पर कोई हक नहीं है" 

खैर अब तो शादी होनी ही थी 15 दिन बाद का मुहूर्त था तो सुरभि ने कोलेज जाना छोड़ दिया था पूरा परिवार रिश्तेदारों से भर गया था सब खुश थे पर क्या सुरभि खुश थी यह शायद वही जानती थी,,,, 
कृष्णा सुरभि के घर आती है सुरभि अपने कमरे में बैठी थी कृष्णा उसके पास बैठकर बोली= कर ली ना सबने अपनी मनमानी तू जानती क्या है उस लड़के के बारे में छ साल बड़ा है वह तुमसे... तुमने ना उससे बात की ना उसने तुमसे एक दूसरे की फोटो तक नहीं देखी अगर तू उससे बात करने में भी कंफर्टेबल नहीं है तो कैसे गुजारेगी एक अजनबी के साथ पूरी जिंदगी... सुरभि मैं यह नहीं कह रही की तू शादी मत कर बस इतना कहना चाहता हूं कि अपने पति को इतना हक मत देना कि चाचा जी की तरह वह भी हर बात पर तुम पर अपना हक जताने लगे..,,,
कृष्णा सब इतना आसान नहीं है और अब इन बातों का कोई मतलब ही नहीं है मां ने कसम दी है हमें कि उनके संस्कारों पर अंगुली ना उठने दे पापा जी के सम्मान पर कोई आंच ना आने दे हम दो घरों की लाज है कृष्णा... हमारी एक गलती से दो घरों की बदनामी होगी और पति का शादी के बाद अपनी पत्नी पर पूरा हक बनता है ये मां ने सिखाया है... सुरभि को शायद जिंदगी की हकीकत समझ आ चुकी थी पर कृष्णा अपने विचारों को कैद नहीं कर सकती थी कृष्णा सुरभि के पास घुटनों के बल बैठकर= सात फेरे लेने से और मांग में सिंदूर लगाने से हम किसी को अपनी जिंदगी की कमाल कैसे सोच सकते हैं सुरभि, अगर कोई हम पर गंदी निगाहे डाले या हमें छुए तो हम अपवित्र हो जाते हैं और अगर शादी के बाद पति हम पर हक जताए तो वह पवित्रता है चाहे हम मन से उन्हें अपनाए या नहीं अपनाए... 
कृष्णा... पीछे से एक औरत की आवाज आई सुरभि की मा पीछे ही खड़ी थी,,, हमारी बेटी के कान भरने की कोई जरूरत नहीं है हम से बेहतर हमारी बेटी को कोई नहीं जानता... उन्होंने तेज आवाज में कहा,,, 
कृष्णा उनके पास आकर= क्या जानती है आप अपनी बेटी के बारे में चाची जी.. क्या वह शादी से खुश हैं..? क्या वह अपने होने वाले पति के नाम के अलावा उसके बारे में और कुछ जानती हैं जिस तरह चार महीने पहले बड़े जीजा जी ने दीदी को मारा था वह रोते हुए यहां आई थी और आपने वापस उन्हें उनके पास भेज दिया अगर कल सुरभि के साथ ऐसा ही हुआ तो वैसा ही करेगी आप... खुद को संभालने की उम्र में आपकी बेटी बच्चों को संभालेगी क्या यही चाहती है आप, जिस तरह आपके बोलने से पहले ही चाचा जी गुस्से से डांट कर आप को चुप करा देते हैं और आप कमरे में एक कोने में बैठ कर रोती है क्या आपकी बेटी भी वैसा ही करें यही चाहती है आप चाचीजी... 
सुरभि की मां के पास भी इन बातों का जवाब नहीं था उनके पास क्या शायद किसी भी औरत के पास इन सवालों का जवाब नहीं था,,, 
कृष्णा प्लीज... सुरभि उसके सामने हाथ जोड़कर बोली कृष्णा भी आंखों में नमी लिए वहां से चली जाती है,,,
सारी रस्मों के बाद आज सुरभि की बरात दरवाजे पर खड़ी थी सुरभि की बहने उसकी सहेलियां उसे तैयार करके वरमाला के लिए लाती है कृष्णा सब के पीछे खड़ी थी क्योंकि शायद सुरभी को उससे बेहतर कोई नहीं जानता था दोनों बचपन से साथ पढ़ती आ रही है सुरभि कॉलेज खत्म करके आगे की पढ़ाई करना चाहती थी ताकि ज्यादा नहीं वह एक टीचर बन सके खुद का खर्चा चला सके, छोटी छोटी जरूरतों के लिए उसे किसी के भी सामने हाथ नही फैलाने पड़े, उसके तो सपने भी ज्यादा बड़े नहीं थे लेकिन शायद उन्हें पूरा करने का भी हक उसे नहीं था,,
दिलीप सुरभि का पति दिखने में 26- 27 साल का था दोनों ने माला पहनाते वक्त एक दूसरे पर एक नजर डाली थी फिर फेरो के लिए बैठाया जाता है हर एक फेरे के साथ सुरभि के अरमान जलते जा रहे थे और पिता से हक अब पति का होता जा रहा था मांग में सिंदूर और मंगलसूत्र के पहनते ही एक अजनबी उसका पति परमेश्वर बन गया था जिसे वह जानती भी नहीं थी,,, विदाई की रसम होती है सबकी आंखों में आंसू थे आखिर उनकी वह बेटी जो पराई हो रही थी जिसे पैदा होते ही कह दिया गया था "इस आंगन में बसेरा कर बैठी एक चिड़िया हो एक दिन अपना घोंसला बना ही लोगी" 
मायका सिर्फ एक बसेरा ही तो है जहां वह रहती है तब तक के लिए जब तक उसका घोंसला यानी ससुराल ना बन जाए,, 
सुरभी के माता-पिता की आंखों में दर्द और खुशी के आंसू थे कि उनकी बच्ची जिसे 19 साल पाल पोस कर बड़ा किया वह उनसे दूर जा रही है और खुशी भी की उन्होंने माता-पिता होने का फर्ज निभाया अपनी जिम्मेदारी पूरी की और अपनी बेटी की जिम्मेदारी उसके आगे की हमसफर के हाथों में सौंप दी,, 
सुरभि की आंखे नम थी की उसके पिता ने उसे जिम्मेदारी समझकर पाला और आज अपनी जिम्मेदारी खत्म कर दी एक बार भी उसे नहीं पूछा कि उसे क्या चाहिए और कृष्णा की आंखों में आंसू थे कि क्या एक दिन उसे भी इसी तरह किसी और के हाथों में थोप दिया जाएगा अपनी दोस्त के टूटते अरमान कृष्णा की आंखों से बह रहे थे,,,

सुरभि अपने नए घर में पहुंचती है कुछ रस्म के बाद उसे एक कमरे में ले जाया जाता है कुछ देर में दिलीप कमरे में पहुंचता है 
"बेटा एक पतिव्रता नारी वही कहलाती है जो अपने पति को पूर्ण समर्पित होती है तुम्हें तन मन से अपने पति को खुद को सोफना होगा"
मां दादी ताईजी दीदी भाभी सब ने यही कहा था ना,,,
सुरभि एक नजर दिलीप को देखती है जो उसकी तरफ बढ़ रहा था,, 
"सुरभी तुम्हारे जिस्म पर तो तुम्हारा हक है ना" कृष्णा की आवाज उसके कानों में गूंज रही थी,,,,  
सुरभि इसी कशमकश में थी कि दिलीप उसके पास आकर बैठ जाता है और उसके चेहरे पर हाथ रख देता है सुरभि नजरें झुका लेती है,,, 
दिलीप उसका चेहरा ऊपर करके= सात फेरे लिए हैं आपने हमारे साथ.. हमारे नाम का मंगलसूत्र और सिंदूर है आपकी मांग में पूरे हक़ से आपको छू रहे हैं.. अब पूरा हक है हमारा आप पर.. आप पत्नी जो है हमारी.... 
सुरभि अपनी आंखें बंद कर लेती हैं आज तक सिर्फ उसकी जिंदगी के फैसले लेने का हक उसके पिता का था पर आज से उसके जिस्म पर भी किसी और का हक हो गया था,,, 

दो दिन बाद सुरभि किसी रस्म के लिए अपने मायके आती है उसके पिता उसका पूरा परिवार सब बहुत खुश थे कृष्णा भी अपनी दोस्त के पास आती है वह सुरभी की तरफ देखती है जो अपने परिवार के बीच बैठी थी चेहरे पर एक मामूली सी मुस्कुराहट पर आंखों में एक गलानी थी चेहरे की खुशी शायद उसकी आंखों में नहीं थी,, मां पापा और परिवार को अपनी जिम्मेदारियों के बोझ से मुक्त कर दिया था आज उसने और अब हक अपने पति को सौंप दिया था और जिंदगी के इस कड़वे सच को शायद सुरभि अपना चुकी थी,,,, 
सुरभि कृष्णा के पास आती है जो एक कोने में खड़ी थी सुरभि की आंखों से बेहताशा आंसू गिरने लगते हैं वह कृष्णा से लिपट जाती है कृष्णा भी उसे बाहों में भर लेती है,,, 
हमने सौंप दिया खुद को उन्हें कृष्णा.. दे दिया पूरा हक नहीं रोक पाए उन्हें.. नहीं कह सके कि हम सम्मान नहीं जीता जागता इंसान हैं जिस पर सब अपना हक जताये... अब हम अपने सपने अपनी खुशियां सब कुछ अपने पति के नाम कर देंगे हमें इस रिश्ते की हकीकत को मानना होगा हमारे पापा जी मां दादा-दादी सब खुश है हमें भी यह नया रिश्ता निभाकर इनका कर्ज चुकाना है...सुरभि अपने आंसुओं के जरिए अपने दर्द को बाहर निकाल रही थी,,,  
बस कर सुरभि.. मैं कुछ नहीं कहूंगी.. नहीं कहूंगी तुम्हें कि क्यों उन्हें हक दिया क्योंकि इस जिंदगी की हकीकत अब मुझे भी समझ आ गई है समझ आ गया है कि हमारी मां का हम पर हक है क्योंकि 9 महीने उन्होंने हमें अपनी कोख में रखा अपना दूध पिलाया हमें खड़ा होना सिखाया... पापा ने हमें पाल पोस कर बड़ा किया हमारी हर जरूरत पूरी की, परिवार ने हमें इस समाज में खड़ा होने के लिए अपना नाम दिया, भाई हमारी रक्षा करता है पति जिंदगी भर हमारे दर्द में हमारी खुशियों में हमारे साथ रहेगा और उसके बाद हमारे बच्चों का हक जो बुढ़ापे में हमे सहारा देंगे इन सब का हक है हमारे ऊपर चाहे वह कैसे भी हो हमें यह स्वीकार करना ही होगा.. लेकिन जिंदगी भर एक सवाल जो हमारे मन में रहेगा कि क्यों हमारा खुद पर हक नहीं है..? क्यों किसी के सहारे के बिना हम जिंदगी की नौका पार नहीं कर सकते.. क्यों हमें भी उसी तरह आजाद नहीं किया जाता जैसे पंछी अपने बच्चों के पंख निकलते ही उन्हें खुले आसमान में अकेले उड़ने को छोड़ देते हैं काश हमारे मां-बाप भी हमें थोड़ा मजबूत बनाते और कह देते कि तुम्हारी जिंदगी का हक अब तुम्हारे ऊपर है जो तुम चाहो वह करो अगर ऐसा होता तो ना हम उनके लिए बोझ बनते ना उनकी जिम्मेदारी और ना हमें उनसे कोई शिकायत होती..... 
सुरभि और कृष्णा का परिवार जो उनके पास खड़ा यह बातें सुन रहा था उनकी आंखों में भी आंसू थे क्योंकि बच्चों के मन में उनके फैसलों को लेकर कितना दर्द रहता है यह सुरभि और कृष्णा की बातों से उन्हें समझ आ गया था पर किसी के पास कहने को कुछ नहीं था और कहते भी तो क्या वही जो कहते आए हैं हक है हमारा तुम पर.....

Note: इस कहानी के जरिए मै किसी भी रिश्ते का अपमान नहीं कर रही बस एक हकीकत आपके सामने रखना चाहती हूं जो मैने अपने आस पास देखी है,, शायद वर्तमान समय में यही कारण है रिश्तों के बीच कड़वाहट का,, कभी हम अपनों को नहीं समझ पाते तो कभी अपने हमें नहीं समझ पाते,,,, 

मनीषा नेटवाल