ड्रीमर
सुबह के सात बज रहे थे घर के सारे लोग अपने अपने काम में व्यस्त थे सिवाय एक को छोड़कर...... बड़े से घर के एक छोटे कमरे में खिड़की से धूप पुरे कमरे में आ रही थी पर उस धूप का महर पर कोई असर नहीं था वह आराम से सोई हुई थी क्योंकि उसका स्पेशल अलार्म अभी बजना बाकी था.....
महर की दादी बाहर से ही रोज की तरह बड़बड़ाते हुए कमरे में आ रही थी - घर के छोटे छोटे बच्चे तक सुबह पांच बजे उठ जाते है लेकिन ये लड़की... धूप सिर पर है मगर उठने का नाम नहीं.....
फिर महर की कंबल साइड में करके - महर उठ जा बेटा.. तूझे उठाते उठाते मैं हार चुकी हूं...
प्लीज़ दादी... थोड़ी देर और आप बाहर चलिए मैं आ रही हूं... महर वापस कम्बल ओढ़ते हुए बोली,,,,,
दादी बिना कुछ बोले वापस बाहर आ गईं थीं क्योंकि उन्हे मालूम था हर रोज़ की तरफ ये उनके कहने पर तो उठने वाली है नहीं......
पहले अलार्म के पांच मिनिट बाद दुसरा अलार्म महर के छोटे भाई बहनों का... जिनसे महर को कोइ फ़र्क नहीं पड़ता था बल्कि वापस उन्हें ही डाटकर भेज देती थीं,,,,
तीसरा अलार्म थोडा हार्मफुल होता था जिसके बाद महर को सीधा उठकर बाहर का रास्ता ही पकड़ना पड़ता था, मम्मी की सुबह सुबह की महागाथा चालु हों चुकी थीं कमरे मे आते ही महर के कम्बल को थोडा गुस्से से साइड में फेंककर - इस कुंभकर्ण को मेरे ही घर में पैदा होना था क्या.. रोज एक घंटा इसको उठाने में चला जाता हैं। इतनी बडी हो गई है काम के एक लक्खण नहीं है.. ऐसे नहीं की अपनी मां का सुबह सुबह काम में हाथ बताये....
फिर हर मदर इंडिया की तरह फेवरेट डायलॉग - शादी के बाद पता नहीं क्या होगा इसका....
महर, उठकर बाहर जाते हुए बोली - एक काम करना मम्मी, शादी के बाद आप चली जाना मेरी जगह... आप तो चार बजे उठ जाती हों ना... फिर तो कोई प्रॉब्लम ही नहीं होगी....
महर बाहर आ गई थी मम्मी उसके पिछे आते हुए बोली - अठारह की हो गई है तु... तेरी उम्र में मैं शादी करके यहां आ गई थी,,,,,,,
कुछ देर में महर तैयार होकर कॉलेज के लिए निकल जाती है,,,,, मेहर जैसे ही कॉलेज के गेट पर पहुंचती है उसकी दोस्त अनाया दौड़ते हुए उसके पास आती है,,,
मेहर, उसे देखकर- क्या हुआ... कॉलेज कहीं भागे थोड़ी जा रहा है जो तू एक्सप्रेस बनकर आ रही है....
अनाया, खुशी से उछलते हुए- यू नो महर... इस बार वेकेशन पर पापा हमे शिमला लेकर जा रहे हैं मेरा बचपन से ड्रीम था कि मैं अपने परिवार के साथ शिमला की ट्रिप पर जाऊं,,,,
मेहर, अनाया के साथ आगे बढ़ते हुए - बढ़िया है यार तेरा ड्रीम पूरा हो रहा है... शिमला तो हर लड़की की फेवरेट जगह होता है... कब जा रही है...
अनाया - तीन दिन बाद... अपनी बेच की सारी गर्ल्स कहीं ना कहीं जा रही है तेरा क्या प्लान है,,,,
मेहर, मुस्कुराते हुए- दो दिन बाद दीदी की इंगेजमेंट हैं फिलहाल तो उसकी तैयारी करनी है और आगे का कोई प्लान नहीं है....
अनाया- मेहर तू तो इस साल से ट्रैकिंग स्टार्ट करना चाहती थी ना... ट्रैकिंग तेरा कितना बड़ा सपना है और इस बार तो तेरी एज भी हो गई... तूने उसके बारे में कुछ नहीं सोचा...
मेहर- ट्रेकिंग मेरा सपना नहीं मेरी जान है, यह मेरे घर वालों से लेकर स्कूल फ्रेंड्स और तुम सब को भी पता है.. बस एक बार गोल्डन अपॉर्चुनिटी(मौका) मिल जाए फिर देखना मेहर और उसके सपने कैसे बड़े-बड़े रास्ते पार करते हैं....
दोनों बातें करते हुए क्लास में पहुंचती है आज फर्स्ट ईयर की लास्ट क्लास थी एग्जाम्स खत्म हो चुके थे तो सारे स्टूडेंट्स छुट्टियों में घूमने जाने की प्लानिंग बना रहे थे,,,
मेहर कॉलेज से घर पहुंचती है जहां दो दिन बाद होने वाले फंक्शन की तैयारियां चल रही थी,, शाम को मेहर के सारे कजंस एक साथ बैठे बातें कर रहे थे,,,
संजना दी (मेहर की कजन सिस्टर) आप इतनी जल्दी शादी के लिए तैयार हो गए.. अभी आपका m.tech. कंप्लीट होने में पूरा 1 साल बाकी है और 6 महीने बाद शादी है... महर ने संजना की तरफ देख कर कहा,,,
संजना - तो इसमें क्या है पढ़ाई तो शादी के बाद भी कंप्लीट हो सकती है ना.. अब हर बात के लिए घरवालों से argue ( बहस) करना भी अच्छा नहीं है वह हमारे लिए जो फैसला लेते हैं कुछ सोच समझकर ही लेते हैं इसलिए मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है,,,,
विवेक (संजना का छोटा भाई) मेहर को चीढ़ाते हुए- महर दो साल बाद तेरा भी नंबर आने वाला है देखना तु भी कुछ नहीं बोल पाएगी....
महर अपने ही सपनों की दुनिया में खोई हुई थी वह विवेक की तरफ देखकर बोली - नहीं भाई... इतनी जल्दी में शादी नहीं करना चाहती, मैं पहले अपने ड्रीम्स पुरे करना चाहती हूं.. किसी की मिसेज बनने से पहले मैं खुद की पहचान बनाना चाहती हूं, मैं कुछ करना चाहती हूं भाई कुछ ऐसा जिससे लोग मुझे किसी और के नाम से नहीं, मेरे खुद के नाम से जाने.. एक अलग पहचान हो मेरी, पहले मैं खुलकर अपने सपनों को जीना चाहती हूं....,,,
संजना - महर सपनों की दुनिया केवल कहानियों में अच्छी लगती है असल जिंदगी में हमारे देखे हुए हर सपने पूरे नहीं होते....
महर, मुस्कुराते हुए - दी.. हर लिखी हुई कहानियां काल्पनिक नहीं होती, कुछ कहानियां असल जिंदगी से पन्नों पर उतारी जाती है, जब हम कुछ करने के सपने देखते हैं ना तो हमारे अंदर एक अलग सा जुनून होता है सपने को पूरा करने का जिद्दिपन होता है.. जो सपनो के लिए हर हद पार कर देता है वहीं सच्चा ड्रीमर (सपने देखने वाला) होता है।
कृष्णा (मेहर की कजन)- हां समझ गए तुम्हें और तुम्हारी सपनों की दुनिया को.....तू बता तुमने बात की चाचाजी से कि तुम ट्रेकिंग करना चाहती हों....
मेहर - नहीं... पर पापा मुझे समझते हैं उन्हें पता है कि मेरा ड्रीम क्या है.. देखना एक बार मौका मिल गया तो पापा बिना कुछ कहे हा बोल देंगे.....
कुछ देर में सब अपने अपने कमरे में चले जाते हैं महर वही बैठी कुछ सोच रही थी।
महर जॉइंट फैमिली में रहती थी और जॉइंट फैमिली में छोटी से छोटी खुशियां भी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है,, तो संजना की सगाई भी बड़ी धूमधाम से हुई,,, चार-पांच दिन बीत चुके थे एक दिन महर के पास उसकी स्कूल फ्रेंड का फोन आता है,,,
महर, फोन उठाकर - हे प्रिया...कैसे कॉल किया....
प्रिया, सामने से - क्यों कॉल करने के लिए कारण होना जरूरी है क्या...?
महर, मुस्कुराते हुए- नहीं....पर मुझे पता हैं तु बिना रीजन के तो कॉल करने वाली है नहीं... इसलिए बता क्या जरूरत आ पड़ी है तुम्हें मेरी....
प्रिया, सामने से - मास्टरमाइंड... सही पहचाना तूने, मुझे कुछ जरूरी बात ही करनी थी तुमसे और वह भी तुम्हारे लिए ही है...
महर, उत्साहित होकर - अच्छा.. तेरी शादी है क्या...
प्रिया- नहीं मेरी मां...मेरी शादी होगी भी तो उसमें तुम्हारी कोई जरूरत नहीं पड़ेगी मुझे... मुझे यह बताना था कि मेरे शहर से मनाली की एडवेंचर है जिसमें मनाली की चंद्रखणी पास(मनाली की तीसरी बड़ी बर्फीली पहाड़ी) की ट्रैकिंग भी होगी, जो ट्रैकिंग करना चाहता है उसके लिए कुछ खास नियम बनाए गए हैं और सबसे पहले पहाड़ी पर पहुंचने वालों को स्कॉलरशिप भी दी जाएगी और उसे आगे की कैरियर के लिए खास ट्रेनिंग भी दी जाएगी,,,,,,,
महर, खुशी से उछलते हुए- क्या.. सच में और तू जा रही है....
प्रिया- तुम्हें पता है मुझे यह ट्रैकिंग वगेरहा बिल्कुल पसंद नहीं पर हम सारे ग्रुप वाले जा रहे हैं केवल मनाली घूमने... तुम्हें तो ट्रैकिंग में इंटरेस्ट है ना इसलिए तुम भी चलना हमारे साथ... इससे अच्छा मौका तुम्हें फिर कभी नहीं मिलेगा....
महर तो कब से इसी मौके की तलाश में थी उसने कहा- थैंक यू यार.. मैं भी कब से यही मौका ढूंढ रही थी मैं घर पर बात करके कल तुम्हें बता दूंगी.. वैसे कब जा रहे हैं.... प्रिया - चार दिन बाद... तुम सुबह बता देना...
मेहर - ठीक है.. बाय...
महर फोन रखकर वही उछलने लगती है जैसे उसे सब कुछ मिल गया हों,,,
महर दौड़ते हुए बाहर सबके पास आती है, वह कितनी खुश थी उसके चेहरे पर साफ नजर आ रहा था,,,
महर की दादी- क्या मिल गया तुम्हें, जो इतनी भागी जा रही हों...
महर, उनके गले में हाथ डाल कर चहकते हुए- दादी मनाली की एडवेंचर... चंद्रखणी पास ट्रेकिंग... गोल्डन चांस मिल गया दादी.......
शारदा (महर की मम्मी)- यह क्या पहेलियां बुझा रही है साफ-साफ बता क्या कहना चाहती हैं......
महर, सबकी तरफ देखकर- प्रिया के शहर से मनाली की एडवेंचर है और वहां चंद्रखणी पास की ट्रेकिंग भी होगी,, सबसे पहले पहुंचने वालों के लिए स्कॉलरशिप और आगे के लिए ट्रेनिंग भी दी जाएगी,,,,,,,
सब महर की तरफ देखते फिर एक दूसरे की तरफ,,,,
महर, उन्हें इस तरह देखकर - क्या हुआ...
शारदा- तु जाना चाहती है वहां....
महर- हां मम्मी.. मैं कब से यही मौका तलाश रही थी अब मौका मिला है तो मैं क्यों नहीं जाऊंगी... आप पापा से बात करना... प्लीज़
दादी - अगर तेरी इच्छा है और तेरे दोस्त जा रहे हैं तो तुम्हारे पापा क्यों मना करेंगे.. हम उनसे बात कर लेंगे... महर अपनी मां की तरफ देखती है तो उन्होंने भी हां बोल दिया, मेहर के पापा घर पर नहीं थे तो उन्हें इस बारे में कुछ मालूम नहीं था सब के कहने पर महर ने प्रिया को जाने के लिए बोल दिया था।
महर खुद पापा से बात करके उन्हें सब कुछ बताना चाहती थी पर मौका ही नहीं मिला, वह जाने की तैयारियां करने लगी, 7 दिन का कैंप था तो उसने एक बड़े से बैग में कपड़े और आवश्यक वस्तुओं को पैक कर के रख दिया था । दो दिन में महर के सारे दोस्त और परिवार को पता चल चुका था क्योंकि महर की एक्साइटमेंट सब कुछ बिना कहे बता रही थी,, यह सबके लिए भले ही एक मामूली बात हो लेकिन महर के लिए किसी वरदान से कम नहीं था । सुबह 9:00 बजे महर को घर से निकलना था उसके घर से प्रिया का शहर लगभग 11से12 किलोमीटर दूर था, आज रात महर की आंखों में बिल्कुल नींद नहीं थी, वह टेबल पर खिड़की के पास बैठी थी उसके सामने उसकी डायरी पड़ी थी और हाथ में पेन था , आज वह डायरी मे अपनी खुशी बयां कर रही थी , उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कुराहट थी,वह लिखना शुरू करती हैं,,,
Hii
मैं बता भी नहीं सकती कि आज मैं कितनी खुश हूं, ऐसा लग रहा है सब कुछ एक सपना हो जो आंखे खोलते ही आंखों से ओझल हो जाएगा... जब 10 साल की थी तब अरुणिमा सिन्हा मेंम का किस्सा सुना था पैर न होने के बावजूद उन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह किया, मेरे तो हाथ पैर सब कुछ है तो मैं क्यों नहीं कर सकती... बछेंद्री पाल, अरुणिमा सिन्हा, प्रेमलता अग्रवाल, संगीता बहल, मलावत पूर्णा, संतोष यादव, काम्या कार्तिकेयन, अंशु जामसेपा, नुग्शी ताशी मलिक, शिवांगी पाठक जिसने 16 की उम्र में माउंट एवरेस्ट फतह किया और भी कितनी महिलाओं ने पर्वतरोही बन देश का नाम रोशन किया,, उन्होंने भी शुरुआत ट्रैकिंग से ही की थी, तो मैं उनमें से एक क्यों नहीं बन सकती... हिमाचल प्रदेश की ऊंची ऊंची बर्फीली पहाड़ियों की चढ़ाई करना कितना अमेजिंग होगा...किसी भी हालत में मुझे सबसे पहले चंद्रखनी पास का रास्ता तय करना होगा ताकि मैं आगे की ट्रेनिंग ले सकूं अब बस जल्दी से सुबह हो जाए और मैं अपने सपनों के सफर पर निकल जाऊं.....
महर
महर ने डायरी को साइड में रखा और सोने चली गई आंखों में बिल्कुल नींद नहीं थी बस सुबह उगने वाले सूरज का इंतजार था,,,,,,
अगले दिन
सुबह सबसे आखिरी में उठने वाली महर आज 5:00 बजे ही उठ गई थी,, वह बार-बार अपने सामान को देख रही थी कि कहीं कुछ छुट न जाए,यह सुबह महर के लिए खास थी पर बाकी सब के लिए तो हर रोज की तरह ही थी तो सब अपने अपने काम के लिए निकल गए,, महर के पापा भी कुछ काम से कहीं बाहर चले गए,,, 8:00 बज गए थे महर तैयार हो चुकी थी लेकिन घर पर कोई नहीं था जो महर को प्रिया के घर छोड़कर आ सके,,,,,
दादी.. पापा कहां गए... मेरे पास एक घंटा बचा है और प्रिया के घर जाने में 45 मिनट लगती है, आपने उन्हें बताया नहीं क्या... महर परेशान होकर बोली,,,
मैंने सुबह ही बताया था उसे कि तू जा रही है.. उसने कुछ नहीं कहा मुझे, मैंने सोचा उसे पहले से पता होगा.... दादी ने कहा,,,,
महर - नहीं दादी.. आपने और मम्मी ने कहा था आप बात कर लेगी तो मैंने नहीं पूछा उनसे...
महर, अपनी मम्मी के पास आकर- मम्मी.. अपने पापा को बताया नहीं कि यह ट्रिप मेरे लिए कितनी जरूरी है.. वो ऐसा कैसे कर सकते हैं....
शारदा, उसे समझाते हुए- ऐसा कुछ नहीं है बेटा.. तुम जानती हो ना अपने पापा को, उन्हें तुम्हारी फिक्र है वह बस थोडे नाराज थे तुमसे कि तुमने बिना उन्हें कुछ बताए इतना बड़ा फैसला ले लिया लेकिन हमने समझाया था उन्हें कि तुम बात करना चाहती थी पर इतना मौका ही नहीं मिला तो उन्होंने कुछ नहीं बोला,,,,
महर को अपना सपना टूटता हुआ नजर आ रहा था उसके चेहरे पर उदासी झलक आई थी, वक्त बीत रहा था,,, महर के पास प्रिया का कॉल आता है - हेलो महर, कितनी देर लगेगी तुम्हें... एक घंटे में बस स्टार्ट होने वाली है,,, प्रिया ने सामने से कहा,,,,
महर को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहें तभी उसकी नजर दरवाजे पर जाती है जहां से उसके पापा आ रहे थे,, महर के चेहरे पर उन्हें देखकर मुस्कुराहट लौट आती है उसने प्रिया से कहा- तु वेट कर.. बस आधे घंटे में मैं पहुंच रही हूं...
कहकर महर ने फोन रख दिया और अपने पापा के पास आई जो पैदल ही आ रहे थे,,,
बाकी बच्चों की तरह महर अपने पापा से फ्रैंक नहीं थी वैसे तो उसके पापा उसे कुछ नहीं बोलते थे लेकिन वह उनकी बहुत इज्ज़त करती थी, उन्होंने एक बार किसी चीज के लिए मना कर दिया तो महर ने कभी उसकी जीत नहीं कि,,,,
महर, उनके पास आकर धीरे से बोली- पापा मुझे लेट हो रहा है...
कितने बजे निकलेगी... महर के पापा ने बिना किसी भाव के पूछा,,,,
महर - 9:00 बजे बस रवाना हो जाएगी... बिल्कुल टाइम नहीं है पापा...
लेकिन घर पर तो बाइक भी नहीं है और न कोई और साधन कैसे जाएगी........
पापा किसी के पास तो होगी ना.. आप भाई के पास कॉल कीजिए वह आ जाएगा... महर बोली,,,,
विनोद (महर के पापा) बिना कुछ बोले वहां से चले गए,,, महर के पास आधा घंटा बचा था वह चुपचाप अपने पापा के बोलने का इंतजार कर रही थी पर विनोद खामोश था उसने ना मना किया और ना हां बोला,,,
महर को उनकी खामोशी चुभ रही थी,,, बाकी जैसे किसी को कोई मतलब नहीं था,,,
महर एकटक अपने पापा को देख रही थी कि वह कुछ तो बोले, काफी देर तक उनका कोई जवाब नहीं मिला तो महर अपने कमरे में आ गई उसने बुझे मन से प्रिया को कॉल लगाया- हैलो प्रिया.. सॉरी यार.. मैं नहीं आ सकती प्रिया- क्या हुआ तुम्हें... अभी कुछ देर पहले तो बोल रही थी कि आधे घंटे में पहुंच जाएगी..
महर की आंखों से आंसू गिरने लगते है, वह खुद को संभालते हुए बोली- हां लेकिन अभी मेरी तबीयत बिल्कुल ठीक नहीं है मैं आ भी गई तो कोई फायदा नहीं...
महर ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलेगा.. एक बार और सोच ले- प्रिया ने कहा,,,
महर- मैंने सोच लिया है... तुम सब मजे करना और हां मेरे पास फोटो सेंड कर देना....
महर बिना प्रिया की बात सुने फोन रख देती है इस वक्त वह कितनी टूट चुकी थी यह केवल वही जानती थी,, फिर भी उसने किसी से शिकायत नहीं की, उसने अपना सामान रखा और वापस बाहर आ गई,, विनोद वहां नहीं थे।
तभी विवेक भी बाइक लेकर पहुंच गया था वह महर के पास आया- सॉरी महर, पता नहीं मेरे दिमाग से कैसे निकल गया... एक बार तू कॉल कर देती मैं वापस आ जाता...
महर, अपनी उदासी छिपाकर मुस्कुराते हुए- कोई बात नहीं भाई...
हमेशा खुश रहने वाली महर के चेहरे की उदासी सबको नजर आ रही थी लेकिन वह सबके सामने रोज़ की तरह ही मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी,,, उसके मन में बार-बार एक ही सवाल था कि उसके पापा क्यों खामोश थे क्या उन्हे उसकी खुशी दिखाई नहीं दे रही थी....
महर अकेली छत पर बैठी थी किसी गहरी सोच में, उसकी मम्मी उसके पास अगर कंधे पर हाथ रखती है मेहर अपनी आंखों के किनारे साफ करते हुए उनकी तरफ देखकर बोली- क्या हुआ मम्मी...
शारदा, उसे एकटक देखते हुए बोली- देख रही हूं कि अपनी खुशी चिल्ला चिल्ला कर सबको बताने वाली अपना दर्द सबसे कैसे छुपाती है, मुझे पता है बेटा तुम्हें बहुत गुस्सा आ रहा है अपने पापा पर..लेकिन शायद कोई कारण होगा वरना आज तक उन्होंने तुम्हें किसी चीज के लिए मना किया है क्या...?
महर, उनकी तरफ देखती हैं जो थोडी उदास थीं महर, हंसते हुए बोली - कृपया हमें भावनाओं में फंसाने की गलती ना करें माताश्री... अब हम बच्चे नहीं हैं... कैसी लगी मेरी सुद्ध हिंदी..
शारदा भी हंसते हुए उसके गाल पर हाथ रखकर- तू नहीं सुधरेगी ना...
महर- बिल्कुल नहीं.. और आप भी इस बारे में बिल्कुल नहीं सोचेगी... सपना टूटा है मम्मी, थोड़ा दर्द तो होगा ही ना... लेकिन कोई बात नहीं कल नया देख लूंगी.. इसके लिए आप मुझे कल जल्दी नहीं उठाओगे...
शारदा, मुस्कुराते हुए गर्दन हिला देती है और वहां से जाने लगती है, महर पीछे से उनका हाथ पकड़कर- पापा को बोल देना उनकी खामोशी ने एक उड़ते हुए पंछी के पर काट दिए... पता नहीं वह पंछी वापस उड़ भी पाएगा या नहीं...
इतना कहकर महर अपने कमरे में आ जाती है शारदा उसे जाते हुए देख रही थी ,,,,
कल रात को सपनो की पहली सीढ़ी चढ़ने की खुशी में महर की आंखों में नींद नहीं थी तो आज इतने दिनों से देख रहे ख्वाब के टूटने के कारण उसकी आंखों में नींद नहीं थी, वो वही खिड़की के पास बैठी थी हाथ में पेन था, सामने डायरी पड़ी थी और आंखों में नमी थी... आज वह अपना दर्द अपनी शिकायतें उस डायरी के पन्नों में लिख रही थी, यह पन्ना उसके पापा के नाम था जो शायद वो उन्हें सामने से नही बोल सकती थी,,, वह लिखना शुरू करती हैं,,,
मुझे आप से कोई शिकायत नहीं है पापा.. और ना ही अपने टूटते सपने का दर्द है क्योंकि मुझे पता है अगर मेरा सपना मेरी किस्मत में लिखा होगा तो वह जरूर मिलेगा... लेकिन आज आपकी खामोशी कांटों की तरह चुभ रही है मुझे मेरे फैसले लेने का हक कब मिलेगा पापा.. मेरी जिंदगी की डोर मेरे हाथों में क्यों नहीं है.. क्यों मुझे उड़ने से पहले ही गिरा दिया.. क्यों आपने अभी तक आकर मुझे यह नहीं कहा कि इस वजह से मैंने तुम्हें रोका.. क्यों पापा....आपकी फिक्र ने मेरा ख्वाब तोड़ दिया.. क्या सच में सपने केवल कहानियों में ही पूरे होते हैं.. आज मैं हार गई पर अपने सपनों को बिखरने नहीं दूंगी आज का दिन शायद में कभी भूल नहीं पाऊंगी कि कैसे आप की चुप्पी ने मुझसे मेरा सुनहरा मौका छीन लिया, पर आगे नहीं.. आपको मुझे समझना ही होगा,,,,,
आपकी महर
5 साल बाद
महर की दादी, विनोद और शारदा बैठे थे विनोद के चेहरे पर आज भी वही खामोशी थी,,, शारदा उदास होकर बोली- एक साल हो गया उसे घर से गए हुए... अब तो अपनी जिद छोड़ दीजिए... गलती क्या है उसकी यही ना कि आप के खिलाफ जाकर उसने अपने फैसले खुद लिए.. आखिर कब तक आपकी खामोशी के पीछे वो अपने सपनों को दबाकर रखती....
विनोद, गुस्से में - बस बहुत बोल दिया आपने और मैंने सुन लिया.. अब उस लड़की का नाम भी नहीं लेगा कोई यहां.. बाप हूं में उसका.. उसकी जिंदगी की हर फैसले लेने का हक है मेरा.. उसने अपने सपनों और परिवार में से किसी एक को चुनने का फैसला ले ही लिया तो अब हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि वह कहां है...?
क्यों पापा गलती क्या है दीदी की... यही ना कि उसने आपसे आपकी खामोशी का जवाब मांगा.. जिस तरह पिंजरे में बंद पंछी आजाद होने के लिए तड़पता है उसी तरह क्या हम बच्चों को कोई हक नहीं है खुले आसमान में उड़ने का... आदित्य (मेहर का छोटा भाई) विनोद के पास आकर बोला,,,,
विनोद किसी गहरी सोच में था, आदित्य उनके उनके पास बैठकर- एक बार खुद को हमारी जगह रखकर देखिए पापा.. क्या आपका मन नहीं करता था कि आप खुद अपने फैसले लो.. अगर आपको एक मौका दिया जाता अपने आप को कुछ साबित करने का तो आप उस मौके का फायदा नहीं उठाते... मेहर दीदी ने हर बार अपने सपनों की कुर्बानी दी है आपके लिए, यह सोचकर कि एक दिन आप उन्हें जरूर समझोगे लेकिन आपने उन्हें कभी समझने की कोशिश ही नहीं की... अगर उस दिन भी मेहर दी ने आपकी बात मान ली होती तो आज वह उस मुकाम पर नहीं होती जहां अभी वो है ...आज उनका सपना पूरा होने को है पर उनके साथ उनका परिवार नहीं... क्यों पापा....
आदित्य एक चिट्ठी निकालता है और उसे विनोद के हाथों में थमाते हुए- यह मेहर दी ने भेजी थी मुझे कुछ दिनों पहले...आपको देने के लिए कहा था लेकिन कभी हिम्मत नहीं हुई,,,,
विनोद वो चिट्ठी लेकर उसे खोलता है जिसमें एक बड़ी सी कविता लिखी थी,,,
नाजुक सी पली-बढ़ी एक
खूबसूरत से बगीचे की कली थी मैं,
रंग बिरंगे फूलों की महक
में खिलती सी खुशबू थी मैं,
क्या सपने क्या जीवन से
बेखबर अपने ही अंदाज में जीती थी मैं,
एक दिन आसमान में
अकेले पंछी को उड़ते देखा
तो ख्याल आया दिल में
क्या, मैं आसमान नहीं छु सकती..?
कुछ बड़ी हुई तो
एक और सवाल आया मन में
आख़िर कौन हूं मैं..?
जवाब में केवल उस
बड़े से बगीचे का नाम मिला,
फिर सवाल आया
कि अगर दूर हुई उस
बगीचे से तो क्या वजूद है मेरा...?
अनगिनत सवालों को लेकर
एक दिन खामोशी सी बैठी थी मैं,
की एक परछाई मुझसे आ टकराई
जब सवाल किया मैंने उसे
कि कौन हो तुम तो
वो मुझ पर ही मुस्कुराई
कहा मुझसे कि पहले खुद को
पहचानो मैं तुम्हें तेरे भीतर
मिल ही जाऊंगी....
वो परछाई चली गई दूर मुझसे
एक और सवाल छोड़ कर...
जब निकली ख़ुद के वजूद को ढूंढने
तो बिन उस बगीचे के एक नयी पहचान सी पाई..
मगर पलट कर देखा तो उस बगीचे मे
ख़ुद की जगह खाली सी पाई...
वजूद मिल गया था उस परछाई को
सपनो की आड़ में...
पर उस बगीचे की वो नन्हीं सी कली कहीं बेघर हो गई
सपनों की खोज में निकली वो कली
अपनों की महक से दूर हो गई ...
आपकी महर
उस कविता को पढ़ते ही सबकी आंखों में आंसू थे मेहर ने कविता मैं अपने सारे सवालों के जवाब रख दिए थे, विनोद के हाथ कांप रहे थे उसकी आंखों के सामने वह दिन था जब मेहर घर छोड़कर जा रही थी,,,
मेहर की कॉलेज खत्म होने के बाद उसने विनोद से कहा था कि अब पहाड़ो की चढ़ाई करने के लिए किसी पहाड़ी इलाके में जाना चाहती है पर उस वक्त भी विनोद ने मना कर दिया,, आज से एक साल पहले मेहर ने एक फॉर्म भरा था ट्रेकिंग के लिए, उसमें उसे जगह मिल गई थी जहां उसे तीन महीनों के लिए बाहर जाना था और स्कॉलरशिप भी मिल रही थी, जब उसने विनोद को यह बात बताई तो इस बार भी उन्होंने मेहर को मना कर दिया,, मेहर के जिद्द करने पर विनोद ने उसके सामने शर्त रखी कि अगर वह जाना चाहती है तो कभी वापस लौटकर नहीं आएगी... मेहर बिना सवाल किए अपना सामान लेकर निकल गई,,,,
वर्तमान में,
शारदा, विनोद कंधे पर हाथ रखकर- अभी भी वक्त है हमारे पास हमारी मेहर को वापस लाने के लिए...
विनोद ने अपना फोन निकालकर किसी के पास कॉल लगाया- हेलो.. मैं मेहर का पिता बोल रहा हूं.. अब कितने किलोमीटर दूर है...?
सामने से कुछ कहा गया तो विनोद के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई उन्होंने फोन रख कर सबकी तरफ देखा जो उसे हैरानी से देख रहे थे,,
विनोद बोला- आप यही सोच रहे हैं ना कि मुझे कैसे पता कि मेंहर कहां है..? आपके सवालो का जवाब हैं मेरे पास... महर बेटी है मेरी... मैं कभी उसके सपनों के बीच नहीं आना चाहता लेकिन हर बाप की तरह मुझे हमेशा डर लगा रहता था कि कहीं मैं अपनी बेटी को खो ना दूं जो सपना वह देख रही थी उसे पूरा करने के लिए पहले मौत के कागजों पर साइन करना पड़ता है उस दिन वह घर छोड़कर गई तो मुझे उसके सपनों का पागलपन नजर आया.. जहां से उसके पास वह सूचना आई थी मैं उनसे मिला उसके बाद मुझे उसके पल-पल की खबर रहती थी की वह कहां है...?
विनोद, मुस्कुराते हुए - पता है उसने भारत के 12 बड़े पहाड़ों की चड़ाई पुरी कर ली है जिनमें से 5 बार सबसे पहले रही तो 3 बार बहुत गहरे जख्म लगे हैं उसे,,, और अब वह वहां है जहां होना हर भारतीयों का गुरूर है इस बार हमारी बेटी अपनों के साथ सपनों की उड़ान भरेगी.......
माउंट कंचनजंगा नेपाल और सिक्किम की सीमा में स्थित है इस पर्वत की समुद्र तल से ऊंचाई 8586 मीटर है यह दुनिया का तीसरा सबसे ऊंचा पर्वत है और भारत का दूसरा,
9 दिन और 8 रातों के सफर के बात मेहर कंचनजंगा की सबसे ऊंची चोटी पर हाथ में भारत का तिरंगा लिए खड़ी थी, ट्रैकिंग ड्रेस, शूज पहने हुए, कंधे पर एक बैग था, चेहरे पर थकान थी पर जीत की खुशी भी... मेहर पहाड़ी से एक नजर चारों तरफ घुमाती है उसे पूरा संसार उस पहाड़ के सामने छोटा दिखाई दे रहा था, खुशी के आंसू उसकी आंखों से छलक रहे थे उसने उस छोटे-से तिरंगे को अपने सीने से लपेटा और ऊपर आसमान की तरफ देखने लगी जो उसे कुछ ही दूरी पर दिखाई दे रहा था, वह जी भर के उस सुकून को जीना चाहती थी,,,
मेहर वापस अपने कैंप में लौटती है जहां सब उसका इंतजार कर रहे थे उसके दोस्त दौड़ते हुए उसके पास आकर उसे उठा लेते हैं उनमें से एक लड़की बोली - यू आर ग्रेट मेहर.. 11 दिन 10 रातो की ट्रैकिंग तुमने 9 दिन और 8 रात में खत्म कर दी,,, you are genius...
मेहर उनकी तरफ देख कर मुस्कुराती है तो एक दूसरी लड़की ने कहा - आगे क्या विचार है मेहर....
माउंट एवरेस्ट..... सब के पीछे से एक आदमी की आवाज आती है तो सब उसकी तरफ देखते हैं वहा मेहर के पापा खड़े थे उनके साथ महर के बड़े पापा और विवेकथा.... मेहर उनकी तरफ देखती है तो उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं विनोद मेंहर के पास आकर उसे गले लगाता है आज दोनों के बीच कोई खामोशी की दीवार नहीं थी ना किसी से कोई शिकायत थी,,,,,
मेहर पुर डेड साल बाद अपने घर लौटी थी सब बहुत खुश थे और मेहर भी.....
मेहर ने वही अपनी पुरानी डायरी उठाई और पूरे जोश के साथ लिखा- if you want to become a prefect dreamer, you never stop dreaming... (अगर आप एक अच्छे सपने देखने वाले बनना चाहते हैं तो सपने देखना कभी बंद मत कीजिए)
मेहर ने अपने प्रयास जारी रखें और माउंट एवरेस्ट की ओर रुख ले लिया... इस बार उसका परिवार और उसके सपने दोनों उसके साथ थे...,,,,,
@मनीषा नेटवाल

